धरमजयगढ़ में हाथी शावकों की मौत के बाद जागे साहब! अब DFO को आई सुरक्षा की याद….

धरमजयगढ़ वनमंडल में लगातार हाथी शावकों की मौत के बाद आखिरकार वन विभाग की नींद खुलती दिखाई दे रही है। छाल परिक्षेत्र के आमामुड़ा तालाब में हाथी शावक की मौत के बाद लंबी-चौड़ी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर ट्रैप कैमरा, थर्मल ड्रोन, रात्रि गश्त और संवेदनशील जलाशयों की निगरानी बढ़ाने की बात कही है। जब धरमजयगढ़ क्षेत्र वर्षों से हाथियों का सबसे संवेदनशील कॉरिडोर माना जाता है, तब अब तक यह व्यवस्थाएं क्यों नहीं की गईं? आखिर कई शावकों की मौत के बाद ही वन विभाग को सुरक्षा इंतजामों की याद क्यों आई?

एक साल से प्रभार में साहब, फिर भी नहीं बनी ठोस योजना
धरमजयगढ़ DFO जितेंद्र उपाध्याय को एक वर्ष पूर्ण हो चुका है, लेकिन इतने संवेदनशील वन क्षेत्र में हाथियों की सुरक्षा को लेकर अब तक कोई प्रभावी जमीनी व्यवस्था नजर नहीं आई। विभाग अब यह कह रहा है कि तालाबों का तकनीकी परीक्षण होगा, सुरक्षित ढलान बनाए जाएंगे और हाथियों की गतिविधियों की वैज्ञानिक मॉनिटरिंग की जाएगी।स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यह तैयारी पहले की गई होती, तो शायद कई हाथी शावकों की जान बचाई जा सकती थी। वन विभाग की कार्यशैली पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि हर घटना के बाद केवल जांच, सैंपल और प्रेस विज्ञप्ति तक मामला सीमित रह जाता है, जबकि जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने रहते हैं।

खुद को दोषमुक्त करने की कोशिश में विभाग?
लगातार हो रही हाथी शावकों की मौत के बाद अब वन विभाग की सक्रियता कई सवाल खड़े कर रही है। क्या विभाग बढ़ते जनाक्रोश और लगातार हो रही घटनाओं के बीच खुद को दोषमुक्त साबित करने की कोशिश कर रहा है?धरमजयगढ़ में हाथियों का विचरण कोई नई बात नहीं है। इसके बावजूद जलाशयों की सुरक्षा, हाथी कॉरिडोर की निगरानी और रेस्क्यू सिस्टम को मजबूत करने में इतनी देरी आखिर क्यों हुई? वन विभाग अब विशेषज्ञों और तकनीक की बात कर रहा है, लेकिन जनता पूछ रही है कि जिन मासूम हाथी शावकों की मौत हो चुकी, उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा? केवल प्रेस नोट जारी कर देने से क्या वन विभाग अपनी जवाबदेही से बच सकता है?




