धरमजयगढ़ तहसीलदार नें फुलेश्वरी के नाम की भूमि को किया सरकारी… ACB रिश्वतकांड की जमीन निकली शासकीय, कूटरचित दस्तावेज किसने बनाए? शासकीय भूमि बेचने वालों पर FIR कब?

धरमजयगढ़।जिस जमीन के मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने रिश्वत प्रकरण में कार्रवाई कर एक कर्मचारी को गिरफ्तार किया था, उसी मामले में अब राजस्व विभाग के आदेश ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। तहसीलदार धरमजयगढ़ हितेश साहू नें शानदार और सराहनीय कार्य करते हुए आदेश के बाद ग्राम अमलीटीकरा के खसरा नंबर 334, 348/2, 349/2, 355/2 और 357/2 को ऑनलाइन राजस्व रिकॉर्ड में दोबारा शासकीय (सरकारी) भूमि दर्ज कर दिया गया है। राजस्व न्यायालय ने पूर्व में किए गए नामांतरण को निरस्त करते हुए भूमि शासन के नाम दर्ज करने का आदेश दिया है। इसके बाद पूरे मामले में कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
अगर जमीन शासकीय थी, तो निजी फुलेस्वर्री के नाम कैसे चढ़ा और बिक्री कैसे हुई?
तहसीलदार के आदेश में उल्लेख किया गया है कि संबंधित भूमि मूल रूप से शासकीय थी, लेकिन बिना वैध अधिकार और सक्षम अनुमति के निजी व्यक्ति फुलेश्वरी के नाम दर्ज हुई। इसके बाद इसी भूमि का विक्रय भी कर दिया गया और नामांतरण की प्रक्रिया पूरी कर दी गई। अब जब राजस्व विभाग ने स्वयं उस नामांतरण को निरस्त कर दिया है और भूमि को फिर से शासन के नाम दर्ज कर दिया है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव किसके आदेश पर हुआ? किसने दस्तावेज तैयार किए? नामांतरण की फाइल किसने आगे बढ़ाई? और किस आधार पर शासकीय भूमि की रजिस्ट्री और नामांतरण की प्रक्रिया पूरी हुई?

कूटरचित दस्तावेजों की जांच होगी या मामला यहीं थम जाएगा?
अब चर्चा इस बात की है कि यदि शासकीय भूमि को निजी बताकर नामांतरण और विक्रय कराया गया, तो क्या इस पूरे प्रकरण में कूटरचित (फर्जी) दस्तावेज तैयार किए गए थे? यदि ऐसा है, तो उन दस्तावेजों को तैयार करने वाले, उनका उपयोग करने वाले तथा पूरी प्रक्रिया में शामिल सभी व्यक्तियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। केवल राजस्व रिकॉर्ड सुधार देना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, बल्कि यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इस कथित गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार कौन था।*
अब कार्रवाई का सबसे बड़ा सवाल— फुलेश्वरी पर FIR कब होगी?

राजस्व न्यायालय के आदेश के बाद अब लोगों की नजर पुलिस और जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर है। क्षेत्र में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जब जमीन दोबारा शासकीय घोषित हो चुकी है, तो कथित फर्जी दस्तावेज तैयार करने, शासकीय भूमि का नामांतरण कराने, विक्रय कराने और यदि किसी अधिकारी-कर्मचारी की मिलीभगत रही है, तो उनके खिलाफ FIR आखिर कब दर्ज होगी? यदि जांच में पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों और संलिप्त अधिकारियों/कर्मचारियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की प्रासंगिक धाराओं के तहत आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।फिलहाल यह मामला केवल एक नामांतरण निरस्तीकरण का नहीं, बल्कि शासकीय भूमि, राजस्व अभिलेखों की विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। अब देखना होगा कि राजस्व विभाग के आदेश के बाद जांच एजेंसियां इस मामले को सिर्फ रिकॉर्ड सुधार तक सीमित रखती हैं या फिर पूरे कथित फर्जीवाड़े की तह तक जाकर जिम्मेदार लोगों को कानून के दायरे में भी लाती हैं।
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