धरमजयगढ़ से सैकड़ों ग्रामीण पहुँचे रायगढ़ कलेक्टरेट… मीटिंग में ऐसा क्या हुआ की वहा कई ग्रामीण नियम और शर्तों पर ही ज़मीन देने की बात कहने लगे…?

जल-जंगल-जमीन और पर्यावरण का मुद्दा कहां गया? — खदान से नुकसान के बीच समर्थन???
धरमजयगढ़। दुर्गापुर खुली कोयला खदान को लेकर कलेक्टर कार्यालय में हुई बैठक के बाद अब ग्रामीणों के रुख को लेकर सवाल उठने लगे हैं। बैठक में बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे और जिला कलेक्टर की बातों को गंभीरता से सुना। बताया जा रहा है कि कुछ वाहनों का व्यवस्था कंपनी द्वारा किया गया था वही कई ग्रामीण जमीन देने के लिए तैयार नजर आए, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जमीन के साथ जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर भी उतनी ही मजबूती से बात रखी गई? जो विरोध में हैं उनका कहना हैं कि आज secl अगर मुआब्जा देती है तो उस पैसे से ऐसी ही कितनी जमीन लोंग खरीद पाएंगे और अगर पैसा ख़तम हो गया तब भविष्य में उनके पास कमाई का क्या साधन बचेगा क्युकी आज वह खेती से सालाना लाखों कमा लें रहें लेकिन ज़मीन ख़तम तो ना खेती बचेगा ना भविष्य में पैसा!
समर्थन देने वालों से सवाल—क्या पर्यावरण की कीमत भी तय होगी?
यदि कुछ ग्रामीण खदान के लिए जमीन देने को तैयार हैं तो उनकी सहमति का सम्मान होना चाहिए, लेकिन साथ ही यह सवाल भी जरूरी है कि क्या उन्होंने पर्यावरणीय नुकसान, जलस्रोतों, जंगल और खेती पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर अपनी शर्तें सामने रखी हैं? सिर्फ मुआवजा मिल जाने से क्या प्रभावित क्षेत्र की प्राकृतिक क्षति की भरपाई संभव होगी?
विरोध करने वालों की चिंता भी सुनना जरूरी
दूसरी ओर, जो ग्रामीण SECL खदान का विरोध कर रहे हैं, उनकी आपत्तियों को भी केवल विकास विरोधी बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज छाल क्षेत्र का हाल देखा जाए तो वहा ख़राब सड़क देख लोंग जाना नहीं पसंद करते, वहा क्या विकास हुआ कंपनी बताए। जितने लोगो को पैसा मिला आज उनकी स्थिति क्या हैं। खदान खुले इतना साल हो गया अबतक वहा सडक नहीं बन पा रहा और यहां विकास की बातें हो रही तो यहां कि स्थिति आगे चलकर क्या होगा सोच सकते हैं।
खदान आएगी तो सिर्फ जमीन नहीं, पर्यावरण भी प्रभावित होगा
कोयला खनन का असर केवल अधिग्रहित जमीन तक सीमित नहीं रहता। बड़े स्तर पर होने वाले ओपनकास्ट खनन से भूमि उपयोग, वन क्षेत्र, धूल, जलस्रोत और स्थानीय पर्यावरण पर प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। ऐसे में प्रभावित ग्रामीणों की आवाज केवल मुआवजे और जमीन के दाम तक सीमित न रहकर जल-जंगल-जमीन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य तक पहुंचनी चाहिए।
अब सवाल सीधा है—अगर जमीन जाएगी, जंगल और पर्यावरण प्रभावित होंगे और लोगों की आजीविका पर असर पड़ेगा, तो सिर्फ जमीन के बदले मिलने वाले मुआवजे को विकास की पूरी कीमत कैसे माना जाए?
SECL खदान को लेकर असली फैसला सिर्फ जमीन देने या नहीं देने का नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन और भविष्य की सुरक्षा का भी होना चाहिए।
कलेक्टर से मिलने से पहले धरमजयगढ़ के SECL खदान प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों की आपसी बैठक… खदान का खुलकर हुआ विरोध…




