धरमजयगढ़ में पर्ची की आड़ में गौतस्करी का कथित खेल! बाजार की रसीद बनी मवेशियों को बुचड़खाने तक पहुंचाने का सुरक्षा कवच?, तीन रास्तों से होकर पहुंच रहे चरखापारा बाजार, जिम्मेदारों की निगरानी पर उठे गंभीर सवाल…

धरमजयगढ़। मवेशियों के बाजार से बाजार तक कारोबार की आड़ में कथित गौतस्करी का एक ऐसा नेटवर्क संचालित होने की जानकारी सामने आ रही है, जिसमें बाजार की पर्ची को सबसे बड़ा बचाव का हथियार बनाया जा रहा है। दूसरे जिलों से यहां के थाना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले मवेशियों को अलग-अलग रास्तों से धरमजयगढ़ होते हुए चरखापारा बाजार तक पहुंचाया जा रहा है। आरोप है कि रास्ते में पुलिस की जांच के दौरान बाजार की पर्ची दिखाकर मवेशियों को छोड़ दिया जाता है। लेकिन असली सवाल यह है कि पर्ची पर दर्ज खरीदार और विक्रेता कौन हैं, मवेशियों को वास्तव में कौन ले जा रहा है और बाजार पहुंचने के बाद उनका अंतिम ठिकाना क्या है? अगर व्यापारी एक बाजार से दूसरे बाजार मवेसी लें जा रहा तो पर्ची क्यों काट रहा और किसके नाम पर काट रहा ऐसे में उस पर्ची का क्या महत्व है?
*तीन रास्तों से चरखापारा बाजार तक पहुंच रहे मवेशी, थाना क्षेत्र बन रहा प्रमुख प्रवेश मार्ग*
दूसरे जिलों शक्ति, कोरबा से बड़ी संख्या में मवेशियों के करताला थाना क्षेत्र में प्रवेश करने और वहां से धरमजयगढ़ होते हुए चरखापारा बाजार तक पहुंचने की बात सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि इस पूरे परिवहन के लिए तीन अलग-अलग रास्तों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पहला रास्ता हाटी से सेमीपाली फिर अमापाली होकर भंडारीमुड़ा से सीधे चरखापारा बाजार तक पहुंचता है। दूसरा रास्ता हाटी से सेमीपाली और क्रोंधा होते हुए चरखापारा बाजार तक जाता है। वहीं तीसरा रास्ता उदउदा, बोरों, लक्ष्मीपुर और मिरिगुड़ा होते हुए चरखापारा बाजार तक पहुंचता है। आज कल बड़ी संख्या में मवेशीयो को भारतमाला सड़क से पिकअप और हाकते हुए लें जा रहें।

*बाजार की पर्ची बनी सबसे बड़ा हथियार, करिया, चंदू, महेश और जीतू जैसे नामों की जांच जरूरी*
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू बाजार की पर्ची है। जानकारी के अनुसार, जिन मवेशियों को रास्ते में पकड़ा जाता है, उनमें से कई के पास बाजार की एक पर्ची मिलती है। हाकने वालों से पूछने पर करिया, चंदू, महेश और जीतू जैसे विक्रेताओं का नाम सामने आता है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि पर्ची किसने बनाई, किसने मवेशी बेचे, किसने खरीदे और पर्ची में दर्ज खरीदार वास्तव में मवेशियों को लेकर जा रहा है या नहीं? यदि एक व्यापारी दूसरे व्यापारी को मवेशी बेचता है और फिर वही मवेशी आगे किसी अन्य व्यक्ति को बेचे जाते हैं तो इस पूरी खरीद-बिक्री की पर्ची का क्या महत्व है या फिर मात्र दिखावा? केवल एक पर्ची देखकर मवेशियों के परिवहन को सही मान लेना पर्याप्त नहीं हो सकता। जांच बेहद जरूरी है।
*100-200 रुपये की मजदूरी पर मवेशी हांकने वाले लोग, पशु क्रूरता की शिकायतों ने बढ़ाई चिंता*

मवेशियों को बाजार तक पहुंचाने के तरीके पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि कई बार मवेशियों को हांककर ले जाने वाले लोग वास्तविक व्यापारी नहीं होते, बल्कि उन्हें महज 100 से 200 रुपये की मजदूरी देकर रास्ते में मवेशियों को ले जाने के लिए रखा जाता है। इस दौरान पशुओं को लंबी दूरी तक पैदल हांकने, एक साथ बड़ी संख्या में ले जाने और उनके भोजन-पानी तथा आराम की व्यवस्था को लेकर भी पशु क्रूरता की आशंकाएं सामने आ रही हैं।
*रात के अंधेरे में पिकअप लोडिंग का खेल, पर्ची दिखाकर छूटने का आरोप; पुलिस जांच का दायरा कितना बड़ा?*

मवेशियों के परिवहन को लेकर एक और गंभीर आरोप रात के अंधेरे में पिकअप वाहनों में लोडिंग का है। बताया जा रहा है कि पैदल मवेशियों को बाजार तक पहुंचाने के बाद रात के समय पिकअप में लोडिंग का खेल भी चलता है। भैसमा बाजार के दिन और शनिवार रविवार की रात अगर भारतमाला सड़क पर देखा जाए तो रात 10 से सुबह 5 बजे तक ऐसे वाहनों की लाइन लगी रहती है जिसमें मवेसी लोड रहतें है।
*हर सप्ताह हजारों मवेशियों की बिक्री का दावा, आखिर खेती के लिए इतनी बड़ी मांग कहां से आ रही?*

चरखापारा बाजार में हर सप्ताह हजारों मवेशियों की खरीद की चर्चा के बीच सबसे बड़ा सवाल की क्या आधुनिक कृषि व्यवस्था में इतनी बड़ी संख्या में क्या किसान खेती के लिए मवेशी खरीद रहे हैं? रायगढ़ एसएसपी शशिमोहन सिंह की कड़ाई की वजह से यह तरीका अपनाया गया है और रायगढ़ जिले के बार्डर बाजार चरखापारा तक पर्ची की आड़ में गौवन्स को बाजार लें जा रहें उसके बाद मवेसी कहा जा रहें कोई नहीं जानता। क्या आधुनिक युग में पशुओ से खेती की इतनी मांग है की चरखापारा बाजार में हर हफ्ते हजारों मवेसी बिक जा रहें और किसान खरीद कर खेती के लिए लें जा रहें। यह अपने आप में सोचने वाली बात है।
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