बकारुमा रेंजर नें जैसे ही बोरों रेंज का प्रभार संभाला उसके बाद ही कोयला माफिया सक्रिय, जंगल के रास्ते पर पोकलेन मशीन उपयोग पर राजसात नहीं… फारेस्ट की चुप्पी…..
प्रभारी वन परिक्षेत्र अधिकारी के आते ही जंगल में फिर सक्रिय हुआ कोल माफिया, रेंजर के पदभार ग्रहण करते ही क्षेत्र के जंगलों में कोयला माफिया एक बार फिर सिर उठाने लगा है। अवैध खनन और तस्करी से जुड़े नेटवर्क ने प्रशासन की मौजूदगी को चुनौती देना शुरू कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक रात के अंधेरे में जंगल से कोयले की धड़ल्ले से ढुलाई की जा रही थी जिसके लिए 3 रास्ते भी तैयार किए गए थे।
वही हफ्तों से तैयार किए जा रहें रास्ते की जानकारी किसी वनरक्षक कों नहीं होना भी अपने आप में सवाल खड़ा करता हैं। जबकि उक्त घटना स्थल कई बीटों के बीच आता हैं और यहां से 3 रास्ते बनाएं गए हैं जो अलग अलग दिशा और अलग वन क्षेत्र कि ओर जाते हैं। आपकों बता दें की कुछ दिन पहले भी बाकारुमा रेंज के अंतर्गत पड़ने वाले जंगलो से कोयला निकलने की समाचार अखबारों की सुर्खियों में था वहा भी जो रेंजर तैनात थे उन्हें ही जनवरी माह में ही बोरों परिक्षेत्र का प्रभार दिया गया हैं और अब बोरों में भी कोयला खनन करते पोकलेन मशीन की जप्ती हुई हैं पर उसपर अब भी वन विभाग राजसात की कार्यवाही नहीं कर रहा..?
जबकि देखा जाए तों मशीन फारेस्ट के रास्ते से होकर गुजरी हैं भले खुदाई राजस्व क्षेत्र में हुई हो पर उक्त स्थल पर इसी मशीन का उपयोग कर 3 रास्तो का निर्माण किया गया हैं जो फारेस्ट होकर गुजरती हैं आखिर मशीन तों फारेस्ट की ज़मीन से होकर ही गुजरी होंगी और जो रास्ता बनाया गया हैं वह फारेस्ट में कही ना कही तो होगा ही तब क्यों मशीन पर राजसात की कार्यवाही नहीं हो रही…? क्या दाल में कुछ काला हैं…? या फिर मशीन कों हवा के रास्ते पेड़ पौधे बचाते हुए सीधे उक्त स्थल पर ही लैंड कर दिया गया होगा…
यह समझ से बाहर हो जा रहा हैं कि क्यों जबतक यहां रेंजर रामजी का प्रभार था तबतक इस प्रकार का घटना सामने नहीं आया पर जैसे हैं बाकारुमा रेंजर कों यहां का प्रभार मिला वैसे मशीन सीधा कोयला खोदने पहुंच गया। अब देखना यह है कि वन विभाग की सख्ती कोयला माफिया पर कितना असर डाल पाती है। स्थानीय ग्रामीणों में भय का माहौल है, वहीं वन विभाग की भूमिका पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।


