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NTPC तिलाईपाली में सच दबाया गया? प्रेस वार्ता बनी सवालों का जाल

चुनिंदा बुलावे फर्जी चेहरे और वर्ल्ड वॉर तक पहुंची चर्चा पत्रकारों ने कहा यह संवाद नहीं प्रबंधन का शो था

कुड़ेकेला:- एनटीपीसी तिलाईपाली की हालिया प्रेस वार्ता अब सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं बल्कि चर्चा और चुटकुलों का विषय बन चुकी है। जिस मंच को संवाद का जरिया होना था वह कहीं न कहीं पूर्व निर्धारित प्रस्तुति में बदलता नजर आया जहां सवालों की दिशा अलग थी और जवाबों की मंजिल कहीं और।सबसे पहले विवाद की चिंगारी वहीं से भड़की जहां से भरोसा शुरू होना चाहिए था।आमंत्रण सूची। जिले के कई सक्रिय और जमीनी पत्रकारों को दरकिनार कर चुनिंदा चेहरों को ही बुलावा भेजा गया। इससे न सिर्फ असंतोष बढ़ा बल्कि यह सवाल भी खड़ा हुआ कि आखिर प्रेस वार्ता में प्रेस की परिभाषा तय कौन कर रहा है।मामला यहीं नहीं रुका। कार्यक्रम में ऐसे चेहरों की मौजूदगी ने और भी हैरान किया जिन्हें देखकर अनुभवी पत्रकार भी एक दूसरे से पूछते नजर आए ये कब से पत्रकार हो गए। आरोप है कि कुछ लोगों को सिर्फ कुर्सियां भरने या माहौल संतुलित रखने के लिए पत्रकार बनाकर अंदर बैठा दिया गया। इससे पूरे आयोजन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए।

पत्रकार सवाल लेकर पहुंचे

असली तस्वीर तब सामने आई जब सवाल जवाब का दौर शुरू हुआ या यूं कहें शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया। कई पत्रकार अपने सवाल लेकर पहुंचे थे लेकिन उन्हें मंच तक पहुंचने का मौका ही नहीं मिला। जिन्हें मौका मिला भी उनके सवालों का जवाब कुछ और ही दिशा में मुड़ गया।हैरानी की हद तब हो गई जब स्थानीय मुद्दों जैसे पर्यावरण विस्थापन सड़क सुरक्षा पर पूछे गए सवालों के जवाब में चर्चा अचानक वैश्विक परिदृश्य और यहां तक कि वर्ल्ड वॉर जैसे विषयों तक पहुंच गई।

मौके पर मौजूद कई पत्रकारों ने बाद में यही कहा समझ नहीं आया कि हम तिलाईपाली की बात कर रहे थे या संयुक्त राष्ट्र की बैठक में बैठ गए थे।इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी साफ कर दिया कि संवाद और प्रस्तुति के बीच की रेखा यहां धुंधली हो चुकी है। जहां सवालों से बचने की कोशिश दिखी वहीं जवाबों में ठोस स्पष्टता की कमी भी नजर आई।जनसंपर्क व्यवस्था भी आलोचना के घेरे में है। न समन्वय स्पष्ट था न प्रक्रिया पारदर्शी। कई पत्रकारों ने इसे मैनेजमेंट का शो करार देते हुए कहा कि अगर सवालों से ही दूरी बनानी है तो फिर इसे प्रेस वार्ता कहने की जरूरत ही क्या है।कार्यक्रम खत्म होने के बाद पत्रकारों के बीच एक लाइन सबसे ज्यादा गूंजती रहीयहां खबर कम कंट्रोल ज्यादा था।अब सवाल यह है कि क्या एनटीपीसी इस आलोचना से कुछ सीखेगा या फिर प्रेस वार्ताएं इसी तरह स्क्रिप्टेड संवाद बनकर रह जाएंगी।

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