
लॉकडाउन उल्लंघन से शुरू हुआ और मौत पर खत्म यह मामला साल 2020 का है, जब लॉकडाउन के दौरान एक पिता और पुत्र को दुकान खोलने के आरोप में पुलिस ने हिरासत में लिया था। आरोप है कि थाने में दोनों के साथ बेरहमी से मारपीट की गई और कई घंटों तक प्रताड़ित किया गया। इस अमानवीय व्यवहार के कारण दोनों की हालत बिगड़ती गई और अंततः उनकी मौत हो गई। इस देश को झकझोर देने वाले कस्टोडियल डेथ केस में अदालत ने बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा दी है। यह फैसला न सिर्फ पीड़ित परिवार के लिए न्याय है, बल्कि पूरे देश में कानून के राज को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। अदालत ने इस मामले को “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” श्रेणी में रखते हुए साफ संदेश दिया कि वर्दी के नाम पर अत्याचार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
CBI जांच में हिरासत में पिटाई की पुष्टि हुई
मद्रास हाईकोर्ट के निर्देश पर राज्य की CB-CID से लेकर CBI को सौंपी गई थी। एजेंसी ने एक इंस्पेक्टर, दो सब-इंस्पेक्टर और अन्य पुलिसकर्मियों समेत 10 आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया था।जांच के दौरान एक महिला कांस्टेबल ने बयान दिया कि पिता-पुत्र को पूरी रात पीटा गया था। थाने में टेबल और लाठियों पर खून के निशान थे। यह गवाही मामले में अहम सबूत बनी। CBI की दलील को माना गया कि हिरासत में दोनों को योजनाबद्ध तरह से टॉर्चर किया गया। इसलिए अधिकतम सजा दी गई। हालांकि जांच में यह भी सामने आया कि सथानकुलम थाने का CCTV फुटेज सुरक्षित नहीं रखा गया। रिकॉर्डिंग रोजाना अपने आप डिलीट हो जाती थी, जिससे महत्वपूर्ण सबूत नहीं मिल पाए।

कोर्ट की सख्ती: ‘कानून से ऊपर कोई नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इसे बेहद गंभीर और अमानवीय कृत्य बताया। कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों पर कानून की रक्षा की जिम्मेदारी है, अगर वही कानून तोड़ें तो यह समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने 9 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह सजा समाज में एक मजबूत संदेश देगी और भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने में मदद करेगी।
न्याय की जीत या सिस्टम पर सवाल?
इस फैसले के बाद देशभर में चर्चा तेज हो गई है। जहां एक तरफ लोग इसे न्याय की बड़ी जीत बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पुलिस व्यवस्था और हिरासत में सुरक्षा को लेकर कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह फैसला एक मिसाल जरूर बनेगा, लेकिन इसके साथ ही पुलिस सुधार और जवाबदेही भी जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोहराई न जाएं।




