जिंदा नाला कागजों में, जमीन पर राख का कब्जा

राख का जहर फैलाकर बसाई जा रही बस्ती, प्रशासन मौन

रायगढ़ :- घरघोड़ा तहसील के टेरम हल्का क्षेत्र में इन दिनों विकास के नाम पर पर्यावरण से खिलवाड़ का गंभीर मामला सामने आया है। यहां नियम-कानूनों को दरकिनार कर एसईसीएल को आवंटित जमीन पर फ्लाई ऐश (राख) का अवैध डंपिंग कर दिया गया है, जिससे एक प्राकृतिक जिंदा नाला पूरी तरह प्रभावित हो चुका है।
जानकारी के अनुसार, खसरा नंबर 1004/1 और 1061/1 की जमीन, जो मूलतः पुनर्वास के लिए निर्धारित थी, अब ठेकेदारों के लिए डंपिंग यार्ड में तब्दील हो चुकी है। जिस नाले के पानी से कभी किसानों के खेत सिंचित होते थे, आज उसी नाले को 10-10 फीट ऊंचे राख के ढेर से पाट दिया गया है। स्थिति यह है कि यह प्राकृतिक जल स्रोत अब सिर्फ सरकारी कागजों में ही जिंदा रह गया है।

विडंबना यह है कि जिस जमीन पर हरियाली और पुनर्वास की योजना होनी चाहिए थी, वहां अब “राख का सफेद जहर” फैलाया जा रहा है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसी राख के ढेर के बीच विस्थापितों के लिए कॉलोनी बसाने की योजना बनाई जा रही है, जो सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, फ्लाई ऐश के बारीक कण हवा में घुलकर सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं, जिससे दमा, त्वचा रोग और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। बूढ़ों और बच्चों के लिए यह स्थिति और भी खतरनाक साबित हो सकती है।
एनजीटी के निर्देशों की अनदेखी

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के स्पष्ट निर्देश हैं कि आबादी क्षेत्र और जल स्रोतों के आसपास फ्लाई ऐश का निपटान नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद यहां न सिर्फ नियमों की अनदेखी की जा रही है, बल्कि एक जीवंत नाले का अस्तित्व ही खत्म कर दिया गया है।
जिम्मेदार कौन? प्रशासन मौन

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बावजूद स्थानीय प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड क्यों चुप्पी साधे हुए हैं? क्या कंपनी प्रबंधन और रसूखदार ठेकेदारों के दबाव में कानून बौना साबित हो रहा है?
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर मामले पर कब संज्ञान लेता है या फिर यह “राख का खेल” यूं ही पर्यावरण और जनस्वास्थ्य को निगलता रहेगा।




