उधार के जूतों से सूरज माशी ने जीता रजत पदक..

साधन और सुविधाओं के अभाव में भी अगर हौसला बुलंद हो, तो कामयाबी कदम चूमती है।
नासिक के युवा धावक सूरज माशी ने इस बात को सच कर दिखाया है। रायपुर में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स की 5000 मीटर दौड़ में सूरज ने रजत पदक (Silver Medal) जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि सूरज ने यह पदक खुद के पास जूते न होने के कारण एक साथी धावक से स्पाइक्स उधार लेकर हासिल किया है।*कोच नहीं, सीनियर्स को देख सीखी बारीकियां*महाराष्ट्र के पालघर जिले के एक छोटे से गांव से आने वाले सूरज की कहानी बेहद संघर्षपूर्ण है। वारली जनजाति से ताल्लुक रखने वाले सूरज एक दिहाड़ी मजदूर के बेटे हैं। आर्थिक तंगी का आलम यह है कि वे 4000 रुपये प्रति माह की कोचिंग फीस देने में असमर्थ हैं।
*सूरज ने अपनी ट्रेनिंग के बारे में बताया:*
”मैं खुद ही अभ्यास करता हूँ। ट्रैक पर अभ्यास कर रहे सीनियर खिलाड़ियों को देखकर दौड़ने की तकनीक सीखता हूँ। जब कभी कोई परेशानी आती है, तो सीनियर्स या ट्राइबल विभाग के कोच से मार्गदर्शन ले लेता हूँ।”
*दौड़ की इनामी राशि से चलता है घर और पढ़ाई*
सूरज फिलहाल नासिक में किराये के कमरे में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। शहर में रहने का खर्च और अपनी ट्रेनिंग का खर्चा निकालने के लिए वे महाराष्ट्र और गुजरात की स्थानीय दौड़ों (Cross-country) में हिस्सा लेते हैं। इन प्रतियोगिताओं से मिलने वाली 3000 से 5000 रुपये की इनामी राशि से ही वे अपना किराया भरते हैं और घर पर अपने पिता को पैसे भेजते हैं।

*चुनौतियों से भरा है पारिवारिक जीवन*
सूरज का जीवन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक मोर्चे पर भी कठिन रहा है। 10वीं कक्षा में उनकी माँ एक हादसे का शिकार होकर चलने-फिरने में असमर्थ हो गईं। पिछले साल उन्होंने अपनी बड़ी बहन को खो दिया। चार बहनों के बाद पैदा हुए सूरज पर अब अपने तीन छोटे भाइयों के भविष्य की जिम्मेदारी भी है। हाल ही में उन्होंने पुलिस भर्ती की कोशिश भी की थी, जहाँ वे शॉट पुट के कारण अंतिम चयन से चूक गए।
*भविष्य की नई उम्मीद*
19 साल के सूरज को उम्मीद है कि खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में मिली यह जीत उनके जीवन की दिशा बदलेगी। महाराष्ट्र सरकार द्वारा पदक विजेताओं को दिए जाने वाले नकद पुरस्कार से उन्हें अपनी ट्रेनिंग और परिवार को आर्थिक सहारा देने में मदद मिलेगी। सूरज का यह पदक केवल एक जीत नहीं, बल्कि उन हजारों आदिवासी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों में बड़े सपने देखते हैं।




